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कविताएँ चन्द नम्बरों की मोहताज हैं, भावनाओं की नहीं / शुभम श्री

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भावुक होना शर्म की बात है आजकल और कविताओं को दिल से पढ़ना बेवकूफ़ी
शायद हमारा बचपना है या नादानी

कि साहित्य हमें ज़िन्दगी लगता है और लिखे हुए शब्द साँस
कितना बड़ा मज़ाक है

कि परीक्षाओं की तमाम औपचारिकताओं के बावजूद
हमे साहित्य साहित्य ही लगता है, प्रश्न पत्र नहीं

ख़ूबसूरती का हमारे आस-पास बुना ये यूटोपिया टूटता भी तो नहीं !
हमे क्यों समझ नहीं आता कि कोई ख़ूबसूरती नहीं है उन कविताओं में
जो हमने पढ़ी थीं बेहद संजीदा हो कर
कई दिनों तक पाग़लपन छाया रहा था
अनगिनत बहसें हुई थीं

सब झूठ था

हमारा प्यार...हमारा गुस्सा...हमारे वो दोस्त, उनके शब्द...
क्योंकि तीन घण्टे तक बैठ कर नीरस शब्दों में देना पड़ेगा मुझे बयान

अजनबियों की तरह हुलिया बताना पड़ेगा उन तीस पन्नों में
मेरे इतने पास के लोगों का

नहीं कह सकती

कि नागार्जुन ने जब लिखा शेफ़ालिका के फूलों का झरना
तो झरा था आँख से एक बूँद आँसू

नहीं बता सकती कि धूमिल से कितना प्यार है
कितना गुस्सा है मुझे भी रघुवीर सहाय की तरह


नागार्जुन-धूमिल-सर्वेश्वर-रघुवीर
सिर्फ़ आठ नम्बर के सवाल हैं !

कैसी मजबूरी है कि उनकी बेहिसाब आत्मीयता का अन्तिम लक्ष्य
छह नम्बर पाने की कोशिश है !

न चाहते हुए भी करना पड़ेगा ऐसा
क्योंकि शब्दों से प्यार करना मुझे सुकून देगा और चन्द पन्नों के ये बयान "कैरियर"