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कविता / नामदेव ढसाल

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रोशनी और अन्धेरे के दरम्यान
प्रेम और दुख के बीच
वेदना के बाद की जगह दे दी कविता को

मैंने जैसे साक्षात
ख़ुद को ही बो दिया खेत में

और मेड़ पर खड़े होकर
इन्तज़ार करता रहा
ख़ुद के उगने का ।

मूल मराठी भाषा से अनुवाद : कैलाश वानखेड़े