भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

काबर समाये रे मोर / छत्तीसगढ़ी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

काबर समाये रे मोर, बैरी नैना मा
काबर समाये रे मोर, बैरी नैना मा
झूलत रहिथे तोरे चेहरा
ए हिरदे के अएना मा
काबर समाये रे मोर, बैरी नैना मा
काबर समाये रे मोर, बैरी नैना मा

अपने अपन मोला हांसी आथे
सुरता मा तोर रोवासी आथे

अपने अपन मोला हांसी आथे
सुरता मा तोर रोवासी आथे
का जादू डारे
ए~ ए~ रे टोनहा तैं
ए पिंजरा के मैंना मा
काबर समाये रे मोर, बैरी नैना मा
काबर समाये रे मोर, बैरी नैना मा

आथे घटा करिया घनघोर
झूमर जाथे मंजूर मन मोर

आथे घटा करिया घनघोर
झूमर जाथे मंजूर मन मोर
पुरवईया असन
आ~ आ~ आजे संगी
पानी हो के रैना मा
काबर समाये रे मोर, बैरी नैना मा
काबर समाये रे मोर, बैरी नैना मा

का होगे मोला तोर गीत गा के
नाचे के मन होथे

काम बुता मा मन नइ लागे
धकर धकर तन होथे
आके कुछु कहिते
ए~ ए~ ए संगवारी
मया के बोली बैना मा
काबर समाये रे मोर, बैरी नैना मा
काबर समाये रे मोर, बैरी नैना मा
झूलत रहिथे तोरे चेहरा
ए हिरदे के अएना मा
काबर समाये रे मोर, बैरी नैना मा
काबर समाये रे मोर, बैरी नैना मा