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किससे हो फरियाद, तपन जी कुछ तो कहिए / अमरेन्द्र

किससे हो फरियाद, तपन जी कुछ तो कहिए
सब-के-सब सय्याद, तपन जी कुछ तो कहिए

कहीं नहीं संवादों का कुछ रस्ता खुलता
केवल वाद-विवाद, तपन जी कुछ तो कहिए

पूरा शहर लहू से लथपथ, घायल है
दंगा है आबाद, तपन जी कुछ तो कहिए

नहीं मानता मैं लेकिन सब ऐसा कहते
जीवन है जल्लाद, तपन जी कुछ तो कहिए

प्रेम-मुहब्बत का ऐवान कहाँ से ठहरे
शक की जब बुनियाद, तपन जी कुछ तो कहिए

शहर आए तो वेतन-बोनस में डूबे हैं
गाँव की भी है याद, तपन जी कुछ तो कहिए

'अमरेन्दर'-सा शायर किनारे मोखा पकड़े
नवसिखुवे को दाद, तपन जी कुछ तो कहिए।