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किसी के काम के नहीं रहे हम / विजय चोरमारे / टीकम शेखावत

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अब किसी के भी काम के नहीं रहे हम
दिनों-दिन बढ़ रही है निरुपयोगिता
फ़िसल रहा हूँ हर ओर से लुढ़कते सेंसेक्स की तरह

बचपन घुट गया पढ़ाई में
जवानी झुलस गई नौकरी में
ट्रेनी से प्रोबशन का लम्बा सफ़र
सीखते-सीखते ग़ालियाँ खाते
सरकता रहा घोंघे की भांति
काम न बताने वाला वह कहलाए आलसी
ग़लतियाँ न बताने वाला कहलाए मूर्ख
टिक पाऊँगा या नहीं के झूले पर झूलते
सन्भल के रखते हुए हर क़दम
बुने सपने सुनहरे भविष्य के —
कब दिन है कब है रात
सोच ही नहीं सका इस सन्दर्भ में
निकाल कर रख दी घड़ी की सुइयाँ
जब बिछोने पर टिक जाए बदन
समझो हो गई है रात
सपने देखने की भी नहीं है फ़ुर्सत
किसी को बसाकर नज़रों में
नहीं कर पाया कल्पनाओं की उड़ान
देख सकूँ कोई मनभावक दृश्य
उसके पहले ही बन्द हो जाती ये आँखे

ढोता रहा ज़िन्दगी को, ज़िन्दा रहते हुए
अपने लिए शायद ही मिला कभी पेट भर भोजन
और बाक़ी
भूख भगाने हेतु लिया वड़ा-पाव, अण्डा-आमलेट
चाय-सिगरेट वगैरह
चलता रहा इस तरह कारवाँ
इसके सिवा और कुछ नहीं
अकेलेपन, दुकेले-तिकेलेपन में भी यही सब
जीने के लिए जब समय ही नहीं तो
जिए किसलिए?
बार-बार फण की तरह सामने आता यह सवाल

वैसे तो सब अपने लिए ही कर रहा हूँ
जैसा सभी कहते हैं, वैसे ही
माँ-बाप को लगता है बेटा मतलबी है
पत्नी को नहीं है भरोसा पत्नी पर
बाप किसी काम का ही नहीं, ऐसा बच्चे सोचते हैं
शेष, आन्दोलन वगैरह बकवास है दूसरों की नज़रों में
जैसे फौज की रोटी, सुख के पिछवाड़े दुःख का झमेला

कैसे जिएँ
नहीं समझ पाए कभी दुनियादारी का
हिसाब किताब
जमा-घटा-गुणा-भाग सही व ग़लत

पुकारा किसी ने
तो हाँ भर दी
हर सम्भव हौसला अफ़जाई की
जहाँ हुआ सम्भव दिलासा देते आया
जहाँ दिए भरोसे
वहीँ आ गई सफ़ाई देने की जानलेवा नौबत
जहाँ भी बँधा भावुक रिश्तों में
वहीँ पर छोड़ दिया गया एकान्त के घनेरे वन में

अपना भी है कोई
हम भी हैं किसी के
शेष नहीं रहा ऐसा कुछ भी

कुल मिलाकर
नहीं रहें किसी के भी काम के हम
यही सच है

ख़ुद अपने भी।

मूल मराठी से अनुवाद — टीकम शेखावत