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किस्सा मछली मछुए का-2 / अलेक्सान्दर पूश्किन

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»  किस्सा मछली मछुए का-2

बूढ़ा झट सागर पर आया
कुछ बेचैन उसे अब पाया ।
मछली को जा वहाँ पुकारा
वह तो तभी चीर जल-धारा,
आई पास और यह बोली-
"बाबा, क्यों है मुझे बुलाया ?"

बूढ़े ने झट शीश झुकाया-
"सुनो बात तुम, जल की रानी
तुम्हें सुनाऊँ व्यथा कहानी,
मेरी बुढ़िया मुझे सताए
उसके कारण चैन न आए,
कहे : कठौता घिसा-पुराना
लाओ नया, तभी घर आना ।"

दिया उसे मछली ने उत्तर-
"दुखी न हो, बाबा, जाओ घर
पाओ नया कठौता घर पर।"

बूढ़ा वापस घर पर आया
नया कठौता सम्मुख पाया।

बुढ़िया और अधिक झल्लाई
और ज़ोर से डाँट पिलाई-
"बिल्कुल बुद्धू तुम, उल्लू हो,
माँगा भी तो यही कठौता
कुछ तो और ले लिया होता ।
उल्लू, फिर सागर पर जाओ,
औ' मछली को शीश नवाओ,
तुम अच्छा-सा घर बनवाओ।"

बूढ़ा फिर सागर पर आया
कुछ बेचैन उसे अब पाया,
स्वर्ण मीन को पुनः पुकारा
मछली तभी चीर जल-धारा,
आई पास और यह पूछा-
"बाबा क्यों है मुझे बुलाया ?"

बूढ़े ने झट शीश झुकाया-
"सुनो बात तुम, जल की रानी
तुम्हें सुनाऊँ व्यथा कहानी,
मेरी बुढ़िया मुझे सताए
उसके कारण चैन न आए,
कहती- जाकर शीश नवाओ
जल-रानी की मिन्नत करके
तुम अच्छा-सा घर बनवाओ ।"

"दुखी न हो, तुम वापस घर जाओ
और वहाँ निर्मित घर पाओ ।"

वह कुटिया को वापस आया
नहीं चिन्ह भी उसका पाया ।
वहाँ खड़ा था अब बढ़िया घर,
चिमनी जिसकी छत के ऊपर
लकड़ी के दरवाज़े सुन्दर ।

बुढ़िया खिड़की में बैठी थी
औ' बूढ़े को कोस रही थी-
"तुम बुद्धू हो, मूर्ख भयंकर
माँगा भी तो केवल यह घर,
जाओ, फिर से वापस जाओ
औ' मछली को शीश नवाओ,
नहीं गँवारू रहना चाहूँ,
ऊँचे कुल की बनना चाहूँ ।"

मूल रूसी भाषा से अनुवाद : मदनलाल मधु