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कुछ का कुछ / जगन्नाथप्रसाद 'मिलिंद'

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घर-घर गाने चला भक्त जब गिरि की दृढ़ता का गुणगान,
उसी रात, उर चीर, प्रेम की गंगा फूट पड़ी गतिमान;
गुणगायक झुँझलाता है—
हाय, युगों के अचल! द्रवित क्यों
पल-भर में हो जाता है?
लिखा महानद-महासिंधु के महामिलन का ज्यों ही गान,
टेढ़ी-मेढ़ी विकल पंक्तियाँ विरह-गीति बन गईं अजान;
कवि कुंठित हो जाता है—
ऐ आनंद, वेदना में क्यों
तू सहसा लय पाता है?
अंकित करने चली तूलिका ज्योंही विस्तृत नील गगन,
किसी नयन का लघु तारा खिंच गया चित्रपट पर तत्क्षण;
चित्रकार चकराता है—
हे असीम, क्यों तू सीमा में
बरबस बँधने आता है?