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कुछ नया-कुछ पुराना / रविशंकर मिश्र

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चिड़िया की चोंच में
चावल का दाना,
देख याद आया
कुछ नया-कुछ पुराना।

बड़ा सा महानगर
और हम अकेले
यादों के पंछी ने
अपने पर खोले

भला लगा छुटकी का
मिस्ड-काॅल आना।

कभी-कभी मन को हैं
जैसे गुहराते
जलते अलाव और
ठंड भरी रातें

रमई काका का
सौ किस्से सुनाना।

दुख भूला, लगा जैसे
सब कुछ है फाईन
माँ-बाबूजी के हुए
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