भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कुछ शे’र / जलील मानिकपुरी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

1.
अब क्या करूँ तलाश किसी कारवाँ को मैं,
गुम हो गया हूँ पाके तेरे आस्ताँ[1] को मैं ।
 
2.
आज आँसू तुमने पोंछे भी तो क्या,
यह तो अपना उम्र भर का हाल है ।

3.
आता नहीं ख़याल अब अपना भी ऐ 'जलील',
इक बेवफ़ा की याद ने सब कुछ भुला दिया ।
 
4.
आप पहलू[2] में बैठे हैं तो संभलकर बैठें,
दिले-बेताब को आदत है मचल जाने की ।

5.
उस गिरिफ़्तारी की पूछो न तड़प जिसके लिए,
दर[3] कफ़स[4] का हो खुला और ताक़ते-परवाज़[5] न हो ।

6.
कफ़स[6] से छूटकर पहुँचे न हम दीवार-ए-गुलशन तक,
रसाई[7] आशियाँ तक किस तरह बेबालोपर[8] होती ।
 
7.
कह दो यह कोहकन[9] से मरना नहीं कमाल[10],
मरकर के हिज्र-ए-यार[11] में जीना कमाल है।
 
8.
कासिद[12] पयाम[13]-ए-शौक को देना न बहुत तूल,
कहना फकत यह उनसे कि आँखें तरस गईं ।

9.
कुछ इख़्तियार नहीं किसी का तबिअत पर,
यह जिस पर आती है बेइख़्तियार[14] आती है ।

10.
कुछ इस अदा से यार ने पूछा मेरा मिजाज,
कहना ही पड़ा शुक्र है परवरदिगार[15] का ।

11.
ख़ूब इन्साफ़ तेरे अंजुमन[16]-ए-नाज में है,
शम्अ का रंग जमे, ख़ून हो परवाने का ।

12.
चाल मस्त, नज़र मस्त, अदा में मस्ती,
जब वह आते हैं लूटे हुए मैखाने को ।

13.
बहार फूलों की नापाइदार[17] कितनी है,
अभी तो आई, अभी उड़ गई हँसी की तरह ।
  
14.
बिछड़ कर कारवाँ से मैं कभी तन्हा नहीं रहता,
रफ़ीक-ए-राह[18] बन जाती है, गर्द-ए-कारवाँ[19] मेरी ।

15.
बिजली की ताक-झाँक से तंग आ गई है जान,
ऐसा न हो कि फूँक दूँ ख़ुद आशियाँ को मैं ।

16.
मस्त करना है तो खुम से मुँह लगा दे साक़ी,
तू पिलाएगा कहाँ तक मुझे पैमाने से ।

17.
मुझसे इरशाद[20] यह होता है तड़पा न करे कोई,
कुछ तुम्हें अपनी अदाओं पर नज़र है कि नहीं ?
 
18.
मुझे जिस दम ख़याले-नर्गिसे-मस्ताना[21] आता है,
बड़ी मुश्किल से काबू में दिले-दीवाना आता है।
  
19.
मुझे तमाम जमाने की आरजू क्यों हो,
बहुत है मेरे लिये इक आरजू तेरी।

20.
मैं समझता हूँ तेरी इशवागिरी[22] को साकी,
काम करती है नजर, नाम पैमाने का है।

21.
मैंने जो तुम्हें चाहा, क्या इसमें ख़ता मेरी,
यह तुम हो, यह आइना, इन्साफ़ करो ।
 
22.
यह जो सर नीचे किए हुए बैठे है,
जान कितनों की लिए बैठे हैं ।

23.
यह सोच ही रहे थे कि बहार ख़त्म हुई,
कहाँ चमन में निशेमन[23] बने या न बने ।

24.
रहे असीर[24] तो शिकवा हुए असीरी[25] के,
रिहा हुआ तो मुझे गम है रिहाई का ।

25.
वादा करके और भी आफ़त में डाला आपने,
ज़िन्दगी मुश्किल थी, अब मरना भी मुश्किल हो गया ।

26.
सब बाँध चुके कब के, सरे-शाख निशेमन,
एक हम हैं कि गुलशन की हवा देख रहे हैं ।

27.
हसरतों का सिलसिला कब ख़त्म होता है 'जलील',
खिल गए जब गुल तो पैदा और कलियाँ हो गईं ।

शब्दार्थ
  1. चौखट, दहलीज़, ड्योढ़ी
  2. पार्श्व, बगल
  3. दरवाज़ा
  4. पिंजड़ा
  5. उड़ने की शक्ति
  6. पिंजड़ा
  7. पहुँच
  8. बिना पंख, जिसके पास जीविका का कोई साधन न हो
  9. पहाड़ काटने वाला, पर्वतभेदी, (शीरी के प्रेम में फरहाद ने शीरीं के कहने से पहाड़ काटते हुए अपने प्राण दे दिए थे)
  10. ्गुण, ख़ूबी
  11. प्रेम की जुदाई या वियोग
  12. डाकिया
  13. संदेश
  14. सहसा, बेतहाशा
  15. ईश्वर, ख़ुदा, परमात्मा
  16. महफ़िल
  17. अस्थायी, थोड़े समय तक रहने वाला
  18. सहयात्री, सहचर, हमसफ़र
  19. रास्ते की धूल
  20. माँग, हुक़्म
  21. मदभरी या नशीली आँखों का ख़याल
  22. जादूगरी
  23. आशियाना, घोंसला, नीड़
  24. बन्दी, क़ैदी
  25. क़ैद, कारावास