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के बाँटतै दरद / प्रदीप प्रभात

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काका, काकी, छोटकी बहिन
ऐलोॅ छै गाँव छोड़ी काल
घोॅर-ऐंगन सब्भें भसलै
भसलै भैंस, बकरी, गाय
बाँसोॅ के चचरी पर बैठी
चेथरू काका कानै
माल-मवेशी, आरो जिनिसोॅ
खातिर माथोॅ धूनै
चारों ओर मचलोॅ छै तबाही
हरियैलोॅ खेतोॅ के होलै बरबादी
कोसी मैया करवट लेलकै
लाखों-लाख बेघर भेलै।
भूखोॅ सें बिलसै छै मुनिया
कानी रहलोॅ छै-
चुनिया, मुनिया, धुनिया।