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कोई क़दम उठे न तेरी राह के बग़ैर / बेगम रज़िया हलीम जंग

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कोई क़दम उठे न तेरी राह के बग़ैर
आए न कोई साँस तेरी चाह के बग़ैर

बस तेरी कु़र्बतों का ख़ज़ाना हो मेरे साथ
हो ख़त्म ज़ीस्त दर्द ओ ग़म ओ आह के बग़ैर

बस इतनी अर्ज़ है के मिले मुझ को बे-हिसाब
जन्नत कहाँ मिलेगी तेरी चाह के बग़ैर

बच्चों के लिख नसीब में ईमान और अमल
मंज़िल पे पहुँचे ये ग़म-ए-जाँ-काह के बग़ैर