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कोई मस्त मलंग लिफ़ाफ़ा / विनय कुमार

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कोई मस्त मलंग लिफ़ाफ़ा।
कोई चपल कुरंग लिफ़ाफ़ा।

मनसबदार हुआ दिल्ली में
जो भी रहा दबंग लिफ़ाफ़ा।

कोमलताएँ कहाँ छिपायें
सारी दुनिया संग-लिफ़ाफ़ा।

बादल की चिट्ठी धरती को
है कितना खुशरंग लिफ़ाफ़ा।

दोनों तरफ़ वही मज़बूरी
लौट गया बैरंग लिफ़ाफ़ा।

शायद अम्मा का खत होगा
आया है बदरंग लिफ़ाफ़ा।

मिला सुकून पढ़े जाने का
लगा अंग से अंग लिफ़ाफ़ा।