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कोजागरी / संतोष श्रीवास्तव

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दूध चाँदनी बिखर रही है
कोजागरी का उजला चाँद
जाने किस को ढूँढ रहा है
बादल बादल भटका चाँद

हम तो तनहा हैं पर दिखता
हमसे ज़्यादा तनहा चाँद
आंसू समझो या मोती जो
शबनम बन टपकाता चाँद

पूरब से पश्चिम का फेरा
रोज लगाता तनहा चाँद
पीकर सूरज की गर्मी को
कितना उज्ज्वल शीतल चाँद

जंगल-जंगल बिखर रही है
रात चांदनी पिघल रही है
अपनी कूची से करता है
सबको रजत रुपहला चाँद

कुमुद खिले महकाए जग को
है चकोर मतवाला कितना
सबका अपना-अपना चांद
सबके हिस्से आता चाँद