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कौन रहता है यहाँ क़ुर्ब में काशाने में / रवि सिन्हा

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कौन रहता है यहाँ क़ुर्ब[1] में काशाने[2] में
ऐसी बेगानगी देखी किसी बेगाने में

ख़्वाहिशें कौन गिने दिल की है वुसअ'त[3] कितनी
एक मूरत की जगह फिर भी सनम-ख़ाने[4] में

दिल कहानी से बहलता ही नहीं है ऐ अदीब[5] 
क्या हक़ीक़त की भी आमद हुई अफ़साने में

ग़म-गुसारी[6] का चलन कुछ तो अभी बाक़ी है
ख़ुद-नुमाई[7] का चलन देखिये ग़म-ख़ाने में

कूचा-ए-ज़ीस्त[8] में जो खेंच के ले जाते थे
अब तो वो लोग भी आते नहीं मय-ख़ाने में

अब्र[9] हैं कौन से दिन-रात मसाइब[10] बरसें
किस समन्दर की दुआ आ गई वीराने में

एक दर्रे से यहाँ आ गयीं सदियाँ सारी
मुस्तक़िल[11] सी हैं यहाँ उज़्र उन्हें जाने में

दहर[12] तारीक़[13] ये कश्कोल[14] में आतिश माँगे
राख में कुछ तो बचा हो किसी दीवाने में

ख़ाक में रूह भी डाले वो हुनर और ही था
कोई पत्थर ही रहेगा तिरे बुत-ख़ाने में

शब्दार्थ
  1. नज़दीकी
  2. घर
  3. आयतन
  4. मन्दिर
  5. साहित्यकार
  6. सांत्वना देना
  7. आत्म-प्रदर्शन
  8. ज़िन्दगी की गलियाँ
  9. बादल
  10. विपत्तियाँ
  11. स्थाई
  12. युग
  13. अँधेरा
  14. भीख का कटोरा