भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कौशल्या / चौथोॅ खण्ड / विद्या रानी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

obal}}

लै राज्याभिषेक के सुसंवाद,
माता सदन गेलै रघुनाथ ।
हिरदय में हुल्लास भरलोॅ छेलै,
माता पूजा करी रहलोॅ छेलै ।

पूजा केरोॅ बाद प्रसन्न मन,
देखलकोॅ आपनोॅ जीवन धन ।
दीऐॅ लागलोॅ पूजा के प्रसाद,
मुदित मन राम करलकोॅ बात ।

हे मात तोरोॅ आज्ञा शिरोधार्य,
मतरकि तात नें देने छै कार्य ।
कालि हमरोॅ होतै अभिषेक,
आज हमरा दुनु के उपवास ।

तोरोॅ आज्ञा नै टारै पारबोॅ,
परसाद लै केॅ हम्में सिर धारबोॅ ।
खाली दै देॅ तुलसी के पात,
केना करि तोरो काटवोॅ बात ।

कौशल्या अति हर्षित होलै,
रामोॅ के हाथोॅ में तुलसी देलकै ।
हृदय में भरलोॅ हुलास अपार,
जगर मगर करै लागलै संसार ।

सबसें पहिलें बोललकी भाय,
दहू संदेश कैकेयी के जाय ।
राम कहलकोॅ सुनोॅ हे माय,
तात अपने संदेश लै के जाय ।

होय गेली संतुष्ट कौशल्या रानी,
सभै लेॅ कहलकी मृदु वानी ।
सब के सन्मति होना चाहियोॅ,
आनंद में बुद्धिनय खोना चाहियोॅ ।

पुलकित हृदय पुलकित अंग,
लगलोॅ जेना जीवन होलोॅ धन्य ।
हमरोॅ राम राजा बनी जैतै,
परजासिनी सुख संतोष पैतै ।

सोने पर जे कहेॅ सुहागा,
दुल्हिन सीता छै सुभागा ।
भाग खोइछा में लेॅ आनलकी,
अइतै ही राजमहिषी बनली ।

कैकेयी सुमित्रा सभै माय,
राम केॅ राजा करै स्वीकार ।
कौशल्या सोचे सभै परकार,
कैन्हों नै लगै ओकरा हपकार ।

जिनगी में अति ही दुख पैलिये,
पुत्रा प्राप्ति लेॅ जग करवैलियै ।
चार पुत्रा तेॅ देलकै विधाता,
ओकरा में मिललै सीता पुनीता ।

ठीक कहै छै जग संसार,
जगतोॅ में होय छै सत्य विचार ।
जेना करि केॅ राम गुणवंत,
होय गेलै सर्वगुण संपन्न ।

वहीं बैठली छेली सुमित्रा,
मनोॅ सें छेलै अति पवित्रा ।
राम हुनका सें आशीष मांगलकोॅ,
दिशा निर्देश के बात कहलकोॅ ।

मुसकाय केॅ बोललकी सुमित्रा,
शुभ शुभ राजा बनी जा राम ।
रोम रोम सें आशीष दै छिहौं,
विधना निर्विघन करौं सब काम ।

बोललकोॅ राम धन्य हे माय,
रोम रोम अनुप्रणित हो जाय ।
ऐन्हों तोहें आशीष देने छौ,
परनाम करै छिहौं हम्में सिर नाय ।

कहे सुमित्रा सुनु हे राम,
पुत्रा बिन मांगले आशीष पावै छै ।
भगवान देथोॅ किरपा बरसाय,
तों राजा बनोॅ सभै सुख पाय ।

शिक्षा देवै बहू सिनी के,
शीलवंती आरु सौम्य धनी के ।
हे राम तोहें तेॅ छौ सयानोॅ,
अच्छा खराब सभै पहचानोॅ ।

गुरुजन सभै केॅ आज्ञा पालन,
जीवन में करने छौ धारण ।
निरमल मन सोचे छै माता,
रामलखन जीइहोॅ दुनु भ्राता ।

आनंदमय भेलैय संसार,
धरती नभ अग जग अपार ।
जेना आनंद सूरज उगि गेलय,
राजभवन के जगमगैलकै ।

रात्रि जागरण करी ऊदिन,
राम के मंगल मनावै मने मन ।
कौशल्या जप तप करलकै,
पूजा हवन करि देवता मनैलकै ।

सीता भी आज्ञा मानलकै,
पतिव्रता रंग काम करलकै ।
मौनब्रत आरु करी उपवास,
धरती पर ही ऊ सुतलकै ।

कल होना छै राज्याभिषेक,
धरम करम के छै निर्देश ।
वैन्हे दुनु नै काज करलकै,
देवी देवता के सुमिरलकै ।

सभे सभे केॅ देवे बधाई,
बच्चा बुतरु नर आरु नारी ।
पुरुष सभै राम लग गेलै,
स्त्राी जानकी कौशल्या लग गेलै ।

सभै सभै के बात सुनैलकै ।
इच्छित बात कही मन हरसैलकै,
जेना विधाता अनुकूल होलै,
सर्व प्रिय रामोॅ केॅ राजा बनैलकै ।

कौशल्या करलकै मनो में विचार,
की करौं कि कटी जाय ग्रह गोचर ।
राजकोष खोली देलकै महरानी,
हीरा, जवाहर, सोना, चाँदी ।

सौंसे नगरी लोग सजैलकै,
ठाम ठाम तोरण द्वार बनैलकै ।
अखंड कीत्र्तन आरु अभिषेक,
हुऐॅ लागलै अयोध्या नगरी शेष ।

माता, राम के शुभ मनावै छेलै,
ओकरा लेॅ जप तप करलकै,
पूजा हवन करि देवता मनैलकै ।
रात्रि जागरण भूमि शयन करलकै ।

माता के हिय के जानै छै,
परमात्मा सें हित पहचाने छै।
निश्छल प्रेम भरलोॅ संसार,
माता हृदय रहे छै उदार।

कहाँ जाऊँ केना केॅ राखों,
जुगल जोड़ी मुख निरखौं परखौं।
सभै बाधा सें हुनका बचावौं,
निरविघिन राम के राजा बनावौं।

हुनकोॅ मनोॅ मं आज्ञा डाके छेलै,
भावी विपदा केरोॅ डोर लगै छेलै।
बड़का बात होलै, राजा बनतै राम,
शुभे शुभ सब हुऐॅ विधाता नै हुऐॅ वाम।

जी धड़कै छेलैय धकोॅ में परान,
कैन्हों पूरा हुऐॅ इ सुन्दर काम।
कत्तेॅ तपस्या सें इ दिन अइलै,
अयोध्या में सभै सुख पैलकै।

की जानै छेलै कौशल्या माता,
वाम होय वाला छै विधाता ।
मातृ हृदय अनुरूप हुनकोॅ धियान,
हर छन चाहे छेलै पुत्रा कल्याण ।

आपनोॅ जानतें सब विधि करलकी,
दान पुण्य, पूजा कुछु नै छोड़लकी ।
देवी, देवता, यक्ष, किन्नर मनैलकी,
अनहोनी काटे लेॅ सब कुछ करलकी।

करमोॅ के लेख नै कटे पारै,
वेद पुराण सब ग्रन्थ उचारै।
हृदय में धुकचुक होय छेलै,
केकरा सें की कहे सके छेलै।