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क्या कहा मुश्किल में राहत का नहीं होता वजूद / ओम प्रकाश नदीम

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क्या कहा मुश्किल में राहत का नहीं होता वजूद ।
धूप ही के साये में होता है साये का वजूद ।

ऐे तअस्सुब इस तरह तू फूल कर कुप्पा न हो,
इस समुन्दर में है तेरा बुलबुले का सा वजूद ।

धर्म से आदम नहीं है आदमी से धर्म है,
गुल का ख़ुश्बू से नहीं गुल से है ख़ुश्बू का वजूद ।

मैं समुन्दर हूँ कोई तालाब या पोखर नहीं,
क्या मिटाएगी तमाज़त मेरे पानी का वजूद ।

मत उछालो मज़हबी नारों के पत्थर ऐे ’नदीम’
इनसे ज़ख़्मी हो न जाए भाईचारे का वजूद ।