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क्या बात थी कि जो भी सुना अन-सुना हुआ / राज नारायन 'राज़'

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क्या बात थी कि जो भी सुना अन-सुना हुआ
दिल के नगर में शोर था कैसा मचा हुआ

तुम छुप गए थे जिस्म की दीवार से परे
इक शख़्स फिर रहा था तुम्हें ढूँढता हुआ

इक साया कल मिला था तिरे घर के आस-पास
हैरान खोया खोया सा कुछ सोचता हुआ

शायद हवा-ए-ताजा कभी आए इस तरफ
रक्खा है मैं ने घर का दरीचा खुला हुआ

भटका हुआ ख़याल हूँ वादी में ज़ेहन की
अल्फ़ाज के नगर का पता पूछता हुआ

चाहा था मैं ने जब भी हदों का फलांगना
देखा था आगे आगे उफ़ुक दौड़ता हुआ

छिटकी हुई थी चाँदनी यादों की शब को ‘राज़’
आँगन मिरे ख़याल का था चौंकता हुआ