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क्या हो हमारी रामकहानी में क्या न हो / सिया सचदेव

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क्या हो हमारी रामकहानी में क्या न हो
बस ये ही चाहते हैं भला हो बुरा न हो

देखा है हम ने बज़्म में छुप छुप के आप को
"ये देखते हुए कि कोई देखता न हो"

वह शख्स जिस ने बाँट लिए हैं जहाँ के ग़म
इन्सां की शक्ल में वो कहीं देवता न हो

तुम सब के ऐब ढूंढ चुके अब करो यह काम
ऐसी जगह पे जाओ जहाँ आइना न हो

मुजरिम पिसर के बाप ने मांगी है ये दुआ
या रब मिरी ज़बां पे कभी बद दुआ न हो

हो जाये तर हर एक मुहब्बत की ओस से
नफरत की मेरे मुल्क में कोई हवा न हो

इक बार देखना है “सिया” उस का अस्ल रूप
लगता है डर वो शख्स कहीं बेवफ़ा न हो