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क्रमशः / कीर्ति चौधरी

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क्रमशः यों बीत गया जीवन पल छिन
कुछ भी तो किया नहीं, था तो अनगिन
बीते की स्मृति में धुन-धुन पछताए
अब तो कुछ कर डालो, बाक़ी है दिन ।