भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

क्रमशः / कीर्ति चौधरी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

क्रमशः यों बीत गया जीवन पल छिन
कुछ भी तो किया नहीं, था तो अनगिन
बीते की स्मृति में धुन-धुन पछताए
अब तो कुछ कर डालो, बाक़ी है दिन ।