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खंड-5 / पढ़ें प्रतिदिन कुण्डलियाँ / बाबा बैद्यनाथ झा

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होता प्रायः स्वजन से, जब विचार वैषम्य।
मत सोचें गंभीर बन, सब होते वे क्षम्य।।
सब होते वे क्षम्य, भिन्न है सबका चिन्तन।
कर लें लाख उपाय, न कर सकते परिवर्तन।
करता पश्चाताप, धैर्य जो इससे खोता।।
संयम से लें काम, कभी जब ऐसा होता।।
 
सबसे पहले त्याग दें, कर्तापन अभिमान।
रहे समर्पण भाव जब, सब करते भगवान।।
सब करते भगवान, वही हैं केवल कर्ता।
उनको दें सब सौंप, जगत के हैं दुख हर्ता।।
कह “बाबा” कविराय, सृष्टि बन पायी जबसे।
सब पर रखते ध्यान, प्रेम भी करते सबसे।।
 
“किंकर” जी को है मिला, यह अनुपम सम्मान।
गदगद् हो सब कर रहे, उनका ही गुणगान।।
उनका ही गुण गान, कार्य सब उत्तम उनके।
कविताओं में प्राण, बसे रहते हैं जिनके।।
इस धरती पर आज, जन्म ले आए दिनकर।
भारतवासी धन्य, प्राप्त हैं जिनको किंकर।।
  
धरती हो यह काव्यमय, खुशियाँ हों नित व्याप्त।
हो रचना करता हुआ, जीवन का सूर्यास्त।।
जीवन का सूर्यास्त, पद्य बिन जीवन सूना।
ओ मेरे आराध्य, लिखूँ मैं प्रतिदिन दूना।।
उर्वर हो मस्तिष्क, रहा जो अबतक परती।
अभिलाषा है एक, काव्यमय हो यह धरती।।
 
भोजन वस्त्र मकान भी, मिले नहीं पर्याप्त।
हो मेरे लिखते हुए, जीवन का सूर्यास्त।।
जीवन का सूर्यास्त, लक्ष्य है केवल रचना।
यह मेरा सर्वस्व, इसी में रोना हँसना।।
नहीं लिखूँ जिस रोज, उसी दिन करता रोदन।
रखता हूँ संतोष, अल्प भी मिलता भोजन।।
 
मूल्यांकन जब हम करें, रहें सदा निरपेक्ष।
ध्यान लगा दें खोज में, छंदधर्म सापेक्ष।।
छंदधर्म सापेक्ष, बनें हम जब आलोचक।
देखें रचनाकार, शब्द के हों संयोजक।।
इतना रखिए ध्यान, हो न जाए अवमूल्यन।
कर सकते हम आप, तभी सुन्दर मूल्यांकन।।
 
अनुपम सारे आपके, दोहे हैं श्रीमान्।
करता इस पर गर्व है, पूरा हिन्दुस्तान।।
पूरा हिन्दुस्तान, आपके गुण गाएगा।
इसके बल पर द्वेष, धरा से मिट जाएगा।।
वैसे सारे छंद, आपके होते उत्तम।
सरस्वती के पुत्र, आपकी रचना अनुपम।।

जाना है जब एकदिन, सबको प्रभु के पास।
कर प्रयास कैसे मिले, प्रभु का दृढ़ विश्वास।।
प्रभु का दृढ़ विश्वास, समर्पण से मिलता है।
कीचड़ में भी फूल, सदा देखो खिलता है।
कह “बाबा” कविराय, परम पद चाहो पाना।
कर्तापन अभिमान, त्याग कर ही है जाना।।
 
 
तेरा मेरा भेद ही, कर देता आसक्त।
भेद भुला सब एक हैं, बनकर प्रभु का भक्त।।
बनकर प्रभु का भक्त, तभी फिर साम्य सिखेगा।
कण-कण में भगवान, यही सर्वत्र दिखेगा।
कह “बाबा” कविराय, जगत है एक बसेरा।
नश्वर है संसार, करो मत तेरा मेरा।।
  
बंधन का कारण बने, कर्त्तापन अभिमान।
कर्म करो जग में मगर, रखकर प्रभु पर ध्यान।।
रखकर प्रभु पर ध्यान, जिसे हो उनसे नाता।
वह होता भव पार, सहित ही प्रभु पद पाता।
कह “बाबा” कविराय, नहीं फिर होगा क्रन्दन।
अनायास प्रभु नाम, छुड़ाए भव का बंधन।।