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ख़ुशियाँ / नरेश अग्रवाल

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मुझे थोड़ी सी ख़ुशियाँ मिलती हैं
और मैं वापस आ जाता हूँ काम पर
जबकि पानी की खुशियों से घास उभरने लगती है
और नदियाँ भरी हों, तो नाव चल पड़ती है दूर-दूर तक ।

वहीं सुखद आवाज़ें तालियों की
प्रेरित करती है नर्तक को मोहक मुद्राओं में थिरकने को
और चाँद सबसे ख़ूबसूरत दिखाई देता है
करवाचौथ के दिन चुनरी से सजी सुहागनों को

हर शादी पर घोड़े भी दूल्हे बन जाते हैं
और बड़ा भाई बेहद ख़ुश होता है
छोटे को अपनी कमीज़ पहने नाचते देखकर

एक थके हुए आदमी को ख़ुशी देती है उसकी पत्नी
घर के दरवाज़े के बाहर इंतज़ार करती हुई
और वैसी हर चीज़ हमें ख़ुशी देती है
जिसे स्वीकारते हैं हम प्यार से।