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ख़्वाबों ने हम पर इतराना छोड़ दिया / समीर परिमल

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ख़्वाबों ने हम पर इतराना छोड़ दिया
दीवारों से सर टकराना छोड़ दिया

एक हवेली रोती है दिल के अंदर
जबसे तुमने आना जाना छोड़ दिया

इतने ग़म, इतने आंसू, इतनी आहें
सबने इस दिल को बहलाना छोड़ दिया

सूख गए हैं पलकों पर कितने सागर
आँखों ने मोती बरसाना छोड़ दिया

सहमी सहमी रहती है ये तनहाई
यादों को इसने उकसाना छोड़ दिया

केसर की क्यारी में रोती है जन्नत
फूलों, कलियों ने मुस्काना छोड़ दिया