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खा के कल हो पेच-ओ-ताब उठा जो दिल से नाला था / 'ममनून' निज़ामुद्दीन

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खा के कल हो पेच-ओ-ताब उठा जो दिल से नाला था
जा के गर्दूं पे चमकता शोला-ए-जव्वाला था

ख़्वाब में बोसा लिया था रात बल्बे-नाज़ुकी
सुब्ह दम देखा तो उस के होंठ पे बुतख़ाला था

वाह री अफ़सुर्दगी इस ख़ातिर-ए-दिल-गीर की
अश्क का क़तरा जो टपका चश्म से सो ज़ाला था

थी ख़्याल-ए-मह-रूख़ाँ से शब बग़ल लब-रेज़ नूर
आब से ख़ाली वलेकिन मय ब-रंग-हाला था

कल ब-रंग-ए-ग़ुचा थी किस से मजाल-ए-गुफ़्तुगू
बात जब करता था मुहँ में दिल का यक परकाला था

बद-गुमानी से डरा वर्ना लिया तेरा जो नाम
देखना बोसे की ख़ातिर मैं लब-ए-दल्लाला था