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खून में डूबे हुए त्योहार / पंख बिखरे रेत पर / कुमार रवींद्र

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खून में डूबे हुए त्योहार
शहर भर में
फिर रहीं हैं बिल्लियाँ खूंखार
शहर भर में

हैं सभी घायल
गली-सडकें-महल-घर
और हैं मासूम बच्चे
रास्तों पर

हो रही है पत्थरों की मार
शहर भर में

हैं खरोंचें सभी चेहरों पर
हवाएँ चुप खड़ी हैं
भीड़ लाशों की घरों में
सीढ़ियों पर हड़बड़ी है

भागने को दिन खड़े तैयार
शहर भर में

खून के हैं लोग प्यासे
नदी में पानी नहीं है
सोचते हैं आयने
यह शक्ल पहचानी नहीं है

जल रही है मोम की दीवार
शहर भर में