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गगन का स्नेह पाते हैं, हवा का प्यार पाते हैं / 'सज्जन' धर्मेन्द्र

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गगन का स्नेह पाते हैं, हवा का प्यार पाते हैं।
परों को खोलकर अपने, जो किस्मत आजमाते हैं।

फ़लक पर झूमते हैं, नाचते हैं, गीत गाते हैं,
जो उड़ते हैं उन्हें उड़ने के ख़तरे कब डराते हैं।

परिंदों की नज़र से एक पल बस देख लो दुनिया,
न पूछोगे कभी, उड़कर परिंदे क्या कमाते है।

बराबर हैं फ़लक पर सब वहाँ नाज़ुक परिंदे भी,
अगर हो सामना अक्सर विमानों को गिराते हैं।

ज़मीं कहती, नई पीढ़ी के पंछी भूल मत जाना,
परिंदे शाम ढलते घोसलों में लौट आते हैं।