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गद्दां बैठ्या गंडकड़ा / मानसिंह शेखावत 'मऊ'

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गांव छोड सहरां बस्या , जड़ सूं छूट्यो हेत ।
गढ पोळां सारा बिक्या , बाड़ा बच्या न खेत ।।

दादीसा इसकूल सूं , नित पोतां नैं ल्याय।
मोड़ो-बेगो ज्ये हुवै, बहू आंतड़ा खाय ।।

नहीं काम घर रो करै , बहू बणी अब मेम ।
भागै बासण छोड कर , जद व्है डूटी-टेम ।।

ऊँठ् या-बासण ठीकरा , सासू सिर सरकाय ।
पोतां की अणभांवती , कुलफी दादी खाय ।।

फौजां में पीठू लद् या , अब थैलो परचूण ।
दादोसा ल्याता फिरै , कदे तेल घी लूँण ।।

फ्लेट किराये रो लियो , सूळी ऊपर सेज ।
हांफल्डो जबरो भरै , चढतां लागै जेज ।।

गाय-बाछड़ी भैंस नीं , नीं छ्याळी रा खोज ।
छाछ-दूध थैल्यां बिकै , जाणैं लागै बोझ ।।

खेत खळां खुद जावता , लाट ल्यावता रास ।
दादोसा अब लोन में , बैठ्या खेलै ताश ।।

दाता रावण बाजिया, लाम्बी मूँछ्याँ खोड़ ।
गयो ठाकरां माजनूं , ठरको ओर मरोड़ ।।

बहु-बेटा बेजां लड़ै , बोलै कोजा बोल ।
घर घर बे'रो पाटगो , बिनां बजायां ढोल।।

दिवर-जिठाण्यां बैठती , करती मन री बात ।
तीजी मन्जिल टांक'दी , छीज रही दिन रात ।।

गद्दां बैठ्या गंडकड़ा , मायत पूंछ हिलाय ।
पदमण म्हैलां पोढगी , कँवर चाय पकड़ाय ।।