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गरीबा / गहुंवारी पांत / पृष्ठ - 1 / नूतन प्रसाद शर्मा

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गहुंआरी पांत

शोषण अत्याचार हा करथय हाहाकार तबाही।
तब समाज ला सुख बांटे बर बजथय क्रांति के बाजा।
करंव प्रार्थना क्रांति के जेहर देथय जग ला रस्ता।
रजगज के टंटा हा टूटत आथय नवा जमाना।
गांव के सच वर्णन नइ होइस, फइले हे सब कोती भ्रांति
जब सच कथा प्रकाश मं आहय, तभे सफलता पाहय क्रांति।
लेखक मन हा नगर मं किंजरत, रहिथंय सदा गांव ले दूर
संस्कृति कला रीति जनजीवन – इंकर तथ्य जाने बस कान।
तब तो लबरइ बात ला लिखदिन, उंकर झूठ ला भुगतत आज
रुढ़ि बात मं संसोधन तब, ठीक राह चल सकत समाज।
एक व्यक्ति हा जेला लिख दिस, दूसर घलो धरिस ओ पांत
जग समाज परिवर्तन आईस, ओकर ले लेखक अनभिज्ञ।
याने गांव के नाम मं शोषण, खूब करिन साहित्यिक लूट
चलत पाठ्य पुस्तक मं रचना, जमिन विश्वविद्यालय खूब।
कई संस्था ले ईनाम झोंकिन, मरगें तभो अमर हे नाम
खुद ला मुंह मं छोटे बोलिन, लेकिन बड़े बड़े पद पैन।
“होत गंवइहा भोला सिधवा, गांव बिराजत हे सुख शांति
ऊपर लिखित बात जे बोलिन, अमृत कल्पवृक्ष असझूठ।
देहाती मन मांग करंय झन, शासन के झन करंय विरोध
भूले रहंय प्रशंसा भर मं, भले यथार्थ कष्ट ला पांय।
गांव के दुख विपदा जे होथय, ओहर रोवत करुण अवाज
शासन ओकर बिपत सुनय नइ, कान मं राखे रुई ला गोंज।
गांव निवासी गिरा पसीना, जांगर टोर बजावत काम
पर भोजन घर कपड़ा कमती, बिना लहू के गुजगुज देह।
“वातावरण शुद्ध गुणकारी’ अइसन बात किहिन कवि सूम
मगर हवा भर जिया सकय नइ, जीवन यज्ञ अन्न के हूम।
गंदा राजनीति अगुवागे, शिक्षा ज्ञान हा पिछवा गीस
दुरमत गांव लड़त आपस मं, कइसे आवय प्रगति विकास!
गांव के पंचायत परपंछी, ओहर कंस शत्रुता बढ़ात
शासन गांव मं फूट करावत, अपन निघरघट राज चलात।
बिरता रुख राई हे हरियर, पर भीतर मन धधकत आग
मनसे मुश्किल मं दिन काटत, माली बसथय उजड़त बाग।
कुकरा बासत मुड़ी उठाके, कोलिहा गीस सुना के राग
पहती समय आलसी सोये, मिहनत करत मिहनती जाग।
भुकरुस भुकरुस ढेंकी बाजत, कूद कूद के कूटत धान
बाहिर बट्टा ले लहुटिन अउ, तिरिया घर मं मारत लीप।
जे बालक हा बिफड़ के रोवत, वृद्धा मन भुरियात मनात
बासी नून पिसान ला सानत, गांकर ला थोपत रख हाथ।
तंह मोहलैन पान मं मोड़त, अंगरा राख करत हे सेंक
गांकर ला कुटका मं टोरत, लइका मन ला देवत खाय।
खटिया त्याग सनम उठ जाथय, मुंह ला धोके चलदिस खेत
धरे कुदारी झौंहा रापा, आये नेत चिंड़ा उपकाय।
मेड़ पोचक खाल्हे बइठे हे, करना हवय मेड़ ला ऊंच
भूमि कन्हार भोंक होवत कइ, भोंक मुंदा के जल रुक जाय।
माटी कोड़ चढ़ावत ऊपर, मेड़ सजावत ढेला चाल
सुर्हलू रचत पिरामिड जइसे, जेमां झन खसलय कई साल।
सनम करिस नंगत अक महिनत, ओकर बाद छोड़दिस खेत
गांव मं झंगलू हा मिल जाथय, जेहर शाला जात पढ़ाय।
कतको झन ले ऋण मांगे हे, लेकिन पटा सकत नइ कर्ज
जीवन हा निकलत चंगुरे अस, साहूकार कहत- बइमान।
“शिक्षक आय राष्ट्र निर्माता’ मात्र छलावा झूठा गोठ
जब आर्थिक स्थिति ठसलग नइ, देश नेव बिन दरके कोठ।
सनम कथय -”बिलमे बर कहिहंव, पर बिलमे बर करबे ढेर
हे तड़तड़ी जाय बर शाला, रुकबे अगर शिकायत होत।”
झंगलू कथय -”ठीक बोलत हस, तंय जानत जनता के हाल
पटवारी ला मित्र बनाथय, पर शिक्षक के खींचत खाल।
पटवारी हा रुपिया लेथय, ऊपर करथय काम अवैध
ओकर कुछ बिगाड़ नइ होवय, ऊपर ले अमरात सलाम।”
झंगलू पहुंचिस समय मं शाला जिंहा हवंय विद्यार्थी।
बइठे हें भुंइया ऊपर ऊंकर तिर कलम न पट्टी।
झंगलू पढ़ई करावत मरमर, रख दिस जोड़ घटाय सवाल
छात्र थुकेल थथमरा जाथय, ओकर तिर नइ कलम न स्लेट।
झंगलू हा गोंटी मंगवाइस, गोंटी गिनत हवंय अब छात्र
जोड़ घटाय के प्रश्न ला राखत, गोंटी ला गिन उत्तर देत।
शिक्षक किहिस -”साठ ठक रुपिया, ओमां खर्च बीस ठन नोट
कतका रुपिया हाथ मं बांचत, एकर तुम सच उत्तर देव?”
धरिस थुकेल साठठक गोंटी, गोंटी बीस अलग कर दीस
गोंटी शेष हवय चालीसा, ओला उत्तर मं ढिल दीस।
झंगलू हा देवत शाबासी -”तुम्हर लगन हा खुश कर दीस
भले पाठ्य सामग्री कमती, पर तुम पढ़त बढ़ा के चाव।
जीवन मं अभाव हा आथय, ढचरा झन मारय इंसान
आय काम पूरा होवत तब, लक्ष्य पूर्ण पावत संतोष।”
तभे तीन ठक डाक आ जाथय, जेकर उत्तर मंगे तड़ाक
झंगलू हा पढ़ाय बर छोड़िस, डड्ढा खींचत रगड़ के नाक।
शिक्षक परेशान हे नंगत, आत नित्य शासन के डाक
अन्य काम हा समय ला खावत, पर शिक्षा बर समय अभाव।
शिक्षक डाक बनाय बिधुन हे, कूदत छात्र करत हें नाच
बाहिर भागत मांग के एक्की, सड़क डहर किलकत चिल्लात।
झंगलू हा सब छात्र ला बोलिस – “तुम बालक मन चंचल खूब
एकोकन थिरथार रहव नइ, झगरा करथव चिलचिल कूद।