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गर्मी / श्रीनाथ सिंह

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गर्मी आई, गर्मी आयी,
खूब करो जी स्नान।
संध्या समय छनै ठंडाई,
हो शरबत का पान
तरी भरी है तरबूजों में,
खूब उड़ाओ , आम।
अजी न लगते खरबूजों के,
लेने में कुछ दाम।
खस की टट्टी लगी हुई है,
पंखे का है जोर ।
आंधी आती धूल उड़ाती,
करती हर हर शोर।
बंद हुआ है स्कूल हमारा,
अब किसकी परवाह?
चलों मौज से दावत खावें,
है मुन्नू का ब्याह।
जल में थोड़ा बरफ डाल दो,
कैसा ठंडा वाह ।
जाड़े में था बैर इसी से,
अब है इसकी चाह।
आओ छत पर पतंग उड़ावें,
सूर्य गये हैं डूब ।
दिन भर घर में बैठे बैठे,
लगती थी अति ऊब।
बजा रहे चिमटा बाबा जी,
करते सीता राम।
पहन लंगोटा पड़े हुए हैं,
कम्बल का क्या काम?
शाम हो गई आओ छत पर,
सोवें पांव पसार।
विमल चांदनी छिटक रही है,
ज्यों गंगा की धार।
लुप लुप करते अगिणत तारे,
ज्यों कंचन के फूल।
हैं मुझकों प्राणों से प्यारे,
सकता इन्हें न भूल।
ऐसी सुखमयी गर्मी को भी,
बुरा कहो क्यों यार ?
मालूम हुआ आज मुझको -
है झूठा सब संसार।