भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

गळगचिया (37) / कन्हैया लाल सेठिया

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पिणघट पराँ पड़ी ठीकरी पूछ्यो-घड़ा मनै ओळखै है के ?
बीच में ही पिणयारी अणख‘र बोली -पैली मूंडो छाणाऊँ रगड़‘र आ-अत्तै में ठोकर लागी‘र घड़ो फूटग्यो ठीकरी ठीकरयाँ स्यूं जा मिली।