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ग़म ए उल्फ़त में जान दी होती / ज़िया फतेहाबादी

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ग़म-ए उल्फ़त में जान दी होती ।
ख़िज्र की उम्र मिल गई होती ।

ताक़त-ए इन्तिज़ार थी कि न थी.
जुर्रत-ए इन्तिज़ार की होती ।

न हुआ हुस्न मूलतफ़ित वरना,
दिल की दुनिया बदल गई होती ।

ज़ब्त-ए ग़म में लबों का हिलना क्या,
बेज़ुबाँ आँख मुलतजी होती ।

मशवरा तर्क-ए मय का ठीक मगर,
शेख़, तू ने कभी तो पी होती ।

जान देते ख़ुशी से मौत अगर,
काशिफ़-ए राज़-ए ज़िन्दगी होती ।

गुनगुनाता कोई ’ज़िया’ की ग़ज़ल,
और फ़िज़ा साज़ छेड़ती होती ।