भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

ग़म नहीं हो तो ज़िंदगी भी क्या / हस्तीमल 'हस्ती'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ग़म नहीं हो तो ज़िंदगी भी क्या
ये गलत है तो फिर सही भी क्या

सच कहूँ तो हज़ार तकलीफ़ें
झूठ बोलूँ तो आदमी भी क्या

बाँट लेती है मुश्किलें अपनी
हो न ऐसा तो दोस्ती भी क्या

चंद दानें उड़ान मीलों की
हम परिंदों की ज़िंदगी भी क्या

रंग वो क्या है जो उतर जाए
जो चली जाए वो खुशी भी क्या