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गिरने न दिया मुझको हर बार सँभाला है / विनय मिश्र

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गिरने न दिया मुझको हर बार सँभाला है ।
यादों का तेरी कितना अनमोल उजाला है ।

वो कैसे समझ पाए दुनिया की हक़ीक़त को,
साँचे में उसे अपने जब दुनिया ने ढाला है ।

ये दिन भी परेशाँ है ये रात परेशाँ है,
लोगों ने सवालों को इस तरह उछाला है ।

इंसानियत का मन्दिर अब तक न बना पाए,
वैसे तो हर इक जानिब मस्जिद है शिवाला है ।

सपनों में भी जीवन है फुटपाथ पे सोते हैं,
जीने का हुनर अपना सदियों से निराला है ।

सब एक ख़ुदा के ही बन्दे हैं जहाँ भर में,
नज़रों में मेरी कोई अदना है, न आला है ।

गंगा भी नहा आए तन धुल भी गया लेकिन,
मन पापियों का अब तक काले का ही काला है।