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गीत 15 / दोसर अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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स्थितप्रज्ञ कछुआ गुण धारै।
सब इन्द्रिय समेट केॅ राखै, विषय न कभी विचारै।

बाँन्ही रखै इन्द्रिय संयम से, पल भर कहीं न भागै
किन्तु निवृति न मिलै, अगर तनियों आसक्ति जागै
अंदर के आसक्ति सदा, इन्द्रिय के संग स्वीकारै
स्थितप्रज्ञ कछुआ गुण धारै।

इन्द्रिय के संयम से प्राणी परमेश्वर के पावै
ईश्वर के अनुभूति पावि सहजें आसक्ति दुरावै
परमेश्वर के बोध जीव के सकल अविद्या जारै
स्थितप्रज्ञ कछुआ गुण धारै।

आसक्ति, इन्द्रिय मन बुद्धि सब के हरण करै छै
जब तक राग नशै नै, मन इन्द्रिय के वरण करै छै
बेर-बेर आसक्ति जागि संयम के साख बिगारै
स्थितप्रज्ञ कछुआ गुण धारै।