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गीत 1 / आठवाँ अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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अर्जुन उवाच-

कहलन अर्जुन हे पुरुषोत्तम कहोॅ ब्रह्म की छेकै?
की छेकै अध्यात्म बतावोॅ, कहों कर्म की छेकै?
केकरा अधिभूत बोलैछै
की अधिदेव कहावै?
कोन छिकै अधियज्ञ बतावोॅ
ऊ तन में कैसें छै?
कैसे ऊ पहचान में आवै छै? जुगती की छेकै?

श्री भगवान उवाच-

कहलन श्री भगवान
परम अक्षर ही ब्रह्म कहावै,
और आतमा के संग अधि लगि
अधियातम कहलावै,
और कर्म हिय में विराग उत्पन्न करना ही छेकै।
उद्भव अरु अवसान
पदारथ ही अधिभूत कहावै,
पुरुष-पुरातन अज-हिरण्मय
जे अधिदेव कहावै,
तन धारी में अधियज्ञ हम, हमर रूप सब छेकै।
हम अधिमत, हम्हीं अधिदेवो
अरु अधियज्ञ हम्हीं छी,
हम अन्तर्यामी स्वरूप
हम सब प्राणी अंदर छी,
दिव्य पुरुष-हरि-सत्य-सनातन नाम हमर सब छेकै।