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गीत 2 / तेसरोॅ अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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कर्म के कैनें बिना निष्कर्मता बिल्कुल असंभव।
कर्म फल के त्याग के बिन सांख्य निष्ठा भी असंभव।

सांख्य निष्ठा पावि साधक
सिद्ध पद पावै सुज्ञानी
सम अवस्था, सिद्ध पद पावी
कहावै तत्त्व ज्ञानी
कर्म के बिन रहि सकै, ई नै कभी किनको से संभव
कर्म के कैनें बिना निष्कर्मता बिल्कुल असंभव।

हय मनुज समुदाय
प्रकृति जनित कर्मों से बंधल छै
उठन-बैठन-खान-पीयन
सयन-चिन्तन में लगल छै
रुदन-गायन, बोलना-चालना-ठठाना सहज संभव
कर्म के कैनें बिना निष्कर्मता बिल्कुल असंभव।

मूढ़ जन इन्द्रिय अपन
हठ बान्हीं केॅ रोकेॅ चहै छै
इन्द्रिय के करि दमन ऊ
विषय के चिन्तन करै छै
सहन मिथ्याचारि दम्भी के मिलत गति से न संभव
कर्म के कैनें बिना निष्कर्मता बिल्कुल असंभव।