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गीत 35 / अठारहवां अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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गीता-गीत वहाँ न गावोॅ
जहाँ रहै तप रहित अनिक्षित उनका कहि न सुनावोॅ।

हे अर्जुन, जे भक्ति रहित, जे दोष दृष्टि अपनैलक
गीता के हय गूढ़ विषय के मूढ़ न कहियो पैलक
हय दैवी सम्पदायुक्त छिक, सहजे तों अपनावोॅ
गीता-गीत वहाँ न गावोॅ।

जे मनुष्य स्वधर्म नै जानै, निम्न विषय सुख भोगै
हमरा में विश्वास न राखै, भौतिक सुख उतजोगै
अपना के सर्वेश्वर समझै, उनकर छोह दुरावोॅ
गीता-गीत वहाँ न गावोॅ।

जे गीता में श्रद्धा न राखै, से महात्म नै जानै
जे गीता में दोष निकालै, हमरा नै पहचानै
हे अर्जुन वै-ठाँ गीता के चर्चा भी न चलावोॅ
गीता-गीत वहाँ न गावोॅ।