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गीत 5 / छठा अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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सुहृद-मित्र-बैरी के संग समान भाव नित धारोॅ
उदासीन-मध्यस्थ-द्वेष्य के संग सम भाव विचारोॅ।

स्वजन-सुधर्मी और विधर्मी
संग सम भाव धरोॅ तों,
ऊँच-नीच या अपन-आन
कहि केॅ नै भेद करोॅ तों,
सम बुद्धि जिनका हे अर्जुन उनके श्रेष्ठ स्वीकारोॅ
सुहृद-मित्र-बैरी के संग समान भाव नित धारोॅ।

मन-इन्द्रिय आरो शरीर के
जे जन बस में राखै,
तजै अपेक्षा, नै भौतिक
साधन संग्रह करि राखै,
रहै सदा एकान्त निवासी, उनका संत विचारोॅ
सुहृद-मित्र-बैरी के संग समान भाव नित धारोॅ।

जे आत्मा के परमात्मा में
हरदम रहै लगैने,
लौकिक-परलौकिक इच्छा के
चित से रहै दुरैने,
प्रबल अपेक्षा महाशत्रु छिक, पहिने एकरा मारोॅ
सुहृद-मित्र-बैरी के संग समान भाव नित धारोॅ।