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गीत 5 / सोलहवां अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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प्रवृत्ति-निवृत्ति नहिं निशिचर जानै
शुभ अरु अशुभ आचरण की छिक, दोनों के सम मानै।

नै बाहर-भीतर के शुद्धता, नै जानै सत्-भाषण
नै मानै अस्तित्व ब्रह्म के, और जगत के कारण
नारी-पुरुष संयोग जगत उद्भव के कारण मानै
प्रवृत्ति-निवृत्ति नहिं निशिचर जानै।

मनगढ़ंत श्रुति अरु पुराण के, जगत स्वनिर्मित भाषै
मिथ्या ज्ञान रखै अवलम्बन, अरु अज्ञान विकासै
सद्-स्वभाव आपन खुद नासै, और कुतर्क बखानै
प्रवृत्ति-निवृत्ति नहिं निशिचर जानै।

बुद्धि मंद अरु कुन्द रखै, स्वभाव रखै अपकारी
राखै कूट विचार जगत के खातिर अनभल कारी
भौतिक सुख के सब सुख मानै, आपन किरति बखानै
प्रवृत्ति-निवृत्ति नहिं निशिचर जानै।