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गीत 7 / पाँचवाँ अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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ज्ञानी कोनो भेद न जानै
ब्राह्मण-गौ-हाथी-कुत्ता के एक भाव से मानै।

उत्तम-मध्यम-नीच भाव के समदर्शी नै जानै
जेना जीव सिर-हाथ-पैर के खुद से भिन्न नै मानै
जैसेॅ ठोकर लगै पाँव में, और आँख तब कानै
ज्ञानी कोनो भेद न जानै।

जिनकर मन सम भाव में स्थिर, से जग के छिक जेता
सम स्वरूप सच्चिदानन्द के, जे छिक परम विजेता
समदर्शी सच्चिदानन्द के सम स्वरूप पहचानै
ज्ञानी कोनो भेद न जानै।

राग-द्वेष अरु मोह न मन में कभी भूल से आनै
समदर्शी अनकर शरीर, अपनोॅ शरीर सन जानै
नै सुख में हर्षित, नै दुख में भी कखनोॅ दुख मानै
ज्ञानी कोनो भेद न जानै।