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गीत 8 / तेरहवां अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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जे ब्रह्मा बनि जग के सिरजै, रूद्र बनी संहार करै
विष्णु बनी केॅ सब अग-जग से बालक जकतें प्यार करै।

वहै ब्रह्म, विभाग रहित
आकाश के जकतें जानोॅ,
वहै ब्रह्म सम्पूर्ण चराचर में
विभक्त छै मानोॅ,
अपन-अपन आकाश बाँटि केॅ, सकल देश मुस्कान भरै।

ऊ परब्रह्म ज्योति के ज्योति अेॅ
माया से जे परे रहै,
बोध-स्वरूप वहॅे परमेश्वर
तत्त्व-ज्ञान से प्राप्त हुऐ,
ऊ परमेश्वर घट-घट वासै, जीवोॅ के उपकार करै।

चाँद-सूरज-विद्युत-तारा
उनके से जगत प्रकाशित,
मन-बुद्धि-इन्द्रिय सब कुछ छै
उनके से उद्भाषित,
हय अध्यातम ज्योत जीव के अनतः के अज्ञान हरै
जे ब्रह्मा बनि जग के सिरजै, रूद्र बनी संहार करै।