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गीत 9 / अठारहवां अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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अर्जुन, सात्विक वहेॅ कहावै
शास्त्र विधि से करै कर्म, कर्ता के भाव न लावै।

देह भाव के करै त्याग जे, सब आसक्ति दुरावै
करल कर्म के फल नै चाहै, राग-द्वेष नै लावै
सतगुण-कर्म ज्ञान उपजावै, परम तत्त्व के पावै
अर्जुन, सात्विक वहेॅ कहावै।

राजस-तामस-कर्म त्यागि केॅ, कर्म के बन्धन काटै
सहजे पावै तत्त्व ज्ञान, जे भौतिक भाव उचाटै
सहजें तयागै अहंकार के, सकल विकार दुरावै
अर्जुन, सात्विक वहेॅ कहावै।

लेकिन राजस कर्म करै छै, और कर्म फल चाहै
भोगेॅ चाहै सकल भोग के, जग से मोह निबाहै
राखै तन के अहंकार जे, कर्ता आप कहावै
अर्जुन, से राजस कहलावै।

राखै तन अभिमान, बनै भौतिक दुख के जे भागी
सकल इन्द्रिय के सुख चाहै, बनै देह अनुरागी
धन दौलत अरु मान बड़ाई, नारी-पुत्र लुभावै
अर्जुन, से राजस कहलावै।

अपना सन केकरो नै समझै, मूरख स्वार्थ परायण
अपने मुँह करै जे तीसो दिन अपनोॅ यश गायन
केतनो मधुर भावै ऊ तैय्यो वाणी तीख बुझावै
अर्जुन, से राजस कहलावै।