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गुमशुदा / अबरार आज़मी

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चलो
फिर ख़ुद को ढूँडे
ज़ात के नज़ारे की कोशिश करें

देखो
वो भूरा दश्त-ए-इम्काँ
दूर तक फैला हुआ है
सामने हद्द-ए-नज़र तक
गहरी तारीकी की नागन रक़्स-फ़रमा है
बिखरती रेत पर
कोई भी नक़्श-ए-पा नहीं है