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गूंगापन / बेल्ला अख़्मादुलिना

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किसमें थी इतनी शक्ति और विवेक?
कौन छीन ले गया मेरे गले की आवाज़?
रो नहीं पाते उसके लिए
मेरे गले के स्याह जख़्म।

ओ मार्च ! सम्मानोचित है तुम्हारी प्रशंसा, तुम्हारा प्रेम,
सरल, सहज है तुम्हारी हर रचना
पर तोड़ चुकी है दम मेरे शब्दों की बुलबुल
अब शब्दकोश ही एकमात्र उद्यान है।
बर्फ़, पहाड़ और झाड़ियाँ
चाहती है कि मैं गाती रहूँ, उन्हें।
कोशिश करती हूँ कुछ बोलने की
पर होँठों को घेर लेता है गूंगापन।


गूंगे मन का हर क्षण
होता है अधिक प्रेरणाप्रद
उन्हें चाहते हैं सहेज कर रखना
जब तक सम्भव हों मेरे शब्द।

घोंट डालूंगी गला, मर जाऊंगी, कहूंगी झूठ
कि अब किसी के नहीं रहेंगे मुझ पर अहसान
पर बर्फ़ से झुके पेड़ों के सौन्दर्य का तो अभी तक
हो नहीं पाया है मुझ से बखान।

बस, कैसे भी राहत मिले
तनी हुई मेरी इन नसों को
सब कुछ रट डालूंगी मैं
जिसे गाने का आग्रह किया जायेगा मुझसे।

इसलिए कि गूंगी थी मैं
और पसन्द थे मुझे शब्दों के नाम
और अचानक थक गई, मर गई मैं
अब तुम स्वयं गाते रहोगे मुझे।

मूल रूसी भाषा से अनुवाद : वरयाम सिंह