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गेंदा के फूल / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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इस चँदनिया धूप में
खिलते हुए नव
हल्दिया, पीले, सिँदूरी, जाफ़रानी औ वसन्ती रंग के
ये फूल गेंदे के-
किकते फूल गेंदे के-
सुकोमल प्राण मेरे बाँध लेते हैं!

प्रेरणा के ये नवल सलमे-सितारों से,
और पँचरँग चेतना की रस-भरी पिचकारियों की
दूर-छूटी प्रथम बूँदों से!
खिल रहे हैं ये सलोने फूल स्नेहल द्वार पर मेरे!
मदिर इनका रंग, इनका रूप,
सँूघ करके शिशिर की झंकृत अमृतमय धूप-
मुझको सहज आती नील झपकी-सी!
ग्राम-पथ की हे यहाँ कितनी सुरीली शान्ति!
पारदर्शी मोहिनी अल्हड़ हवा है!
और कबरी-कत्थई मिट्टी अहा, कितनी नरम-मीठी-
कि जिसकी काँख में पल कर हुए इतने बड़े
मृदु फूल ये गबरू!
सरसराते पवन में इनको ठुमकता देख
मेरे चरण कँपते हैं-
मछलियों-सी डोलती हैं जबकि ये अलमस्त चीलें
दूर-हाँ, अति दूर-धूपहले गगन में!

रस-भरे गेंदे मुझे लगते-
रसीली राल टपकाते
सलोने दूध-काया सरल शिशुओं-से, कि जो-
अब तक बरारबर पग नहीं लेने लगे हों,
और भगने की बड़ी भरपूर कोशिश में-
पकड़ में आ गये हों-
ज्योंकि माँ के!

फूल ये मेरे बड़े मनभावते हैं-
बहुत बचपन से!