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घनाक्षरी / मिलन मलरिहा

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(1)

नष्ट झिनकरा संगी, रुखराई वन बन
जीवजन्तु कलपत, सुन ले पुकार रे।
प्राण इही जान इही, सुद्ध हवा देत इही
झिन काट रुखराई, अउ आमाडार रे।
कल-पत हे चिराई, घर द्वार टूटे सबो
संसो-छाए लईका के, आंसु के बयार रे।
जीव के अधार इही, नानपन पढ़े सबो
आज सबो पढ़लिख, होगे हे गवार रे!

(2)

पर घर नास कर, छाबे जब घर संगी
काहापाबे सुखसांती, बिछा जही प्यार रे।
अपन बनौकी बर, दुख तैहा ओला देहे
भोग-लोभ करकर , बिगाड़े संसार रे।
सबोके महत्व हे जी, खाद्य श्रृंखला जाल म
छोटे नोहै कहुं जीव, करले बिचार रे।
नदि नाला जंगल ले, उपजे गांव गांव ह
रुखराई जीवजन्तु, आज तै सवार रे।

(3)
बोस तै महान गा (घनाक्षरी)
माटी के मान खातिर, देस के सान खातिर
हिंद सेना गढ़ डारे, बोस तै महान गा
खून मोला देवा सबो, मैंहा तो आजादी देहुँ
नारा देके गाव-गली, खोजे तै जवान गा
खेतखारे तैहा जाके, कहे तै बनिहारे ला
माटी सेवा बड़ करे, देस के किसान गा
देस मांगे कुरबानी, सुन लेवा मोर बानी
भेज बेटा हिंद फौज, माटी के मितान गा।
(4)
कहत हावे बोस हा, सुन गा किसान मोर
बाहुबली तन तोर, छोड़ तै निसान गा
मुठा भा गोरा मनके ढ़ेटु ला मसक देबे
आधाझन के डर मा, छुट जाही प्रान गा
चला सबो एक होवा, तिरंगा के आन बर
माता भारती पुकारे, चंडी के समान गा
आगी सही धधक जा, ज्वाला सही भड़क जा
हिन्द-सेना सेर बन, हर ले तै जान गा।