भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  रंगोली
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

घर घर डोलऽहे नउनियाँ, त हाथ ले महाउर हे / मगही

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

घर घर डोलऽहे[1] नउनियाँ,[2] त हाथ ले महाउर[3] हे।
राजा, मोरा तूँ रँगा दऽ पियरिया[4] महल उठे सोहर हे॥1॥
जसोदा जी नंद के बोलाय के सभे हाल पूछल हे।
राजा, गुनी[5] सभ अधिको न जाँचथि, हिरदा जुड़ाइ देहु[6] ना॥2॥
नंद कयलन धनदान से[7] मन हरखायल हे।
गेयानी गुनी सभ भेलन नेहाल[8] अउरो कुछ चाहिए हे?॥3॥
किया तोरा चाह हउ[9] नउनियाँ, माँगु मुँह खोली खोली गे।
नउनियाँ, देबऊ में अजोधेया के राज, आउरो कछु चाहही[10] गे॥4॥
हँसि हँसि बोलहइ नउनियाँ त सुनहु बचन मोरा हे।
राजा हम लेबो सोने के सिकड़िया, अजोधेया राज की करब हे?॥5॥
जसोदा जी देलकन[11] सिकड़िया, रोहन[12] गल हाँसुल[13] हे।
राजा देलन पाट पिताम्बर, महल उठे सोहर हे॥6॥
आवहु नयना[14] से गोतनी अउरो सभ सुन्नर[15] हे।
गावहु आज बधइया, महल उठे सोहर हे॥7॥
बूढ़ीं सूढ़ी देलकन असिसववा जुअहु[16] पूत पंडित हे।
ललना, सुनरी के नयना जुड़ायल लोग बाग हरखित हे॥8॥
जे इह सोहर गावल, गाइ सुनावल हे
ललना जलम जलम अहियात, पुतर फल पावल हे॥9॥

शब्दार्थ
  1. डोलती फिरती है
  2. नाइन
  3. महावर
  4. पीले रंग की साड़ी
  5. गुणी जन
  6. शीतल कर दो, संतुष्ट कर दो
  7. सो, इसलिए
  8. निहाल, सकल मनोरथ सिद्ध
  9. इच्छा है
  10. चाहती हो
  11. दी
  12. रोहिणी, बलदेव की माँ
  13. गले में पहनने वाली हँसुली
  14. सुनयना नाम की स्त्री
  15. सुन्दरियाँ
  16. स्वस्थ होकर बढ़ो, युवक हो