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चरागे़जीस्त बुझा दिल से इक धुआँ निकला / यगाना चंगेज़ी

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चराग़-ए-जीस्त[1] बुझा दिल से इक धुआँ निकला।

लगा के आग मेरे घर से मेहरबाँ निकला॥


तड़प के आबला-पा[2] उठ खड़े हुए आख़िर।

तलाशे-यार में जब कोई कारवाँ निकला॥


लहू लगा के शहीदों में हो गए दाख़िल।

हविस तो निकली मगर हौसला कहाँ निकला॥


लगा है दिल को अब अंजामेकार का खटका।

बहार-ए-गुल से भी इक पहलु-ए-ख़िज़ाँ निकला॥


ज़माना फिर गया चलने लगी हवा उलटी।

चमन को आग लगाके जो बाग़बाँ निकला॥


कलाम-ए- 'यास' से दुनिया में फिर इक आग लगी।

यह कौन हज़रते ‘आतिश’ का हमज़बाँ निकला॥



शब्दार्थ
  1. जीवन-दीप
  2. पाँव के छाले