चाबी वाली गुड़िया / संतोष श्रीवास्तव
वह चलती थी
उनकी मर्जी से
वे जितनी चाबी भरते
उतना चलती
वरना सजी रहती थी
शोकेस में
खिलौने की तरह
चाबी भरते ही
फिरकनी-सी घूमती
सुबह से रात तक
नीली आँखों में
उल्लास भर सोख लेती थी
उनकी उदासी भर ताकत
उनके इशारे पर
पूरे शरीर में ऊर्जा भरे
बस उनके
सिर्फ उनके लिए
हर दिन ,हर पल
जीती रही,
कुर्बान होती रही
फिर एक दिन
चाबी घूमी ही नहीं
"जंग खा गई है शायद
बदलनी पड़ेगी यह चाबी "
उसके आसपास
आवाजें उभरीं
सहम गई वह
बिना चाबी के
उसका ख़ुद को
चला पाना कठिन था
आता ही नहीं था उसे
बिना चाबी के चलना
अपने कलपुर्जों को हिला पाना
वह पूरा जीवन उनके लिए
उनके इशारों पर ही तो
होम होती रही
खुद को भूल कर
न जाने किस कलपुर्जे में
कौन से टूटे सपने पड़े थे
जिनका आहत बोझ लिये
अंधेरे गर्त में समाती
चाबी वाली गुड़िया
कि उजाले की एक किरण ने
उसे सहलाया
और उसने ख़ुद को
एक बहुत बड़े
प्रकाशवान आंदोलन के बीच पाया
जहाँ बहुत-सी चाबी वाली गुड़ियाँ
बिना चाबी भरे मुस्कुरा रही थीं
स्वयं की अर्जित मुस्कुराहट से