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चाय के बहाने / योगेंद्र कृष्णा

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कुछ लोग
शहर के पंच-सितारा होटलों
रेस्तराओं में बैठ कर
चाय नहीं पीते

अपने से कमतर
आम आदमी से
बहुत अलग
और ख़ास दिखने का
सुखद अहसास पीते हैं वे

पीते हैं वे
उनकी बदहालियों
से अपने भीतर पैदा हुई
खुशहालियां

उनकी उस चाय में
मिठास की जगह
घुल रहा होता है
दूसरों की पीड़ा और बेचारगी से
पूरी तरह निस्संग
और उदासीन रहने का सुख

क्योंकि
उनकी प्यालियों के आसपास
चूल्हे पर उबलते दूध की
सोंधी खुशबू नहीं होती
और नहीं होता
खुला आसमान धुआं और पसीना...
धूल मिट्टी पेड़ हवा
और ढावों के आसपास खेलते
हंसते-खिलखिलाते
नंग-धड़ंग बच्चे भी नहीं होते वहां

वो जगहें
उनकी मोटी अभेद्य खोल होती हैं
जिसके भीतर वे बार-बार
घुसते और निकलते हैं

जहां बंद कमरे की एसी
से निकलता जहर
और बार गर्ल्स की व्यापारिक मुसकाने
उनकी चाय की प्याली में
तूफान खड़ा करती है
और वे
साफ शफ्फाफ कपड़ों में भी
नंगे नजर आते हैं

इसीलिए…
इसीलिए शायद
उनके खोल के बाहर निकलते ही
नंग-धड़ंग ये बच्चे
उनकी नंगई पर हंसते हैं...