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चिड़ियाँ बोलें / सभामोहन अवधिया 'स्वर्ण सहोदर'

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चिड़ियाँ चह-चूँ चह-चूँ बोलें,
घुलमिल करती खूब किलोलें!

जागें तड़के छोड़ बसेरा,
फेरा देवें हुआ सवेरा।
हँस-हँस चहक-चहक मुँह खोलें,
चिड़ियाँ चह-चूँ, चह-चूँ बोलें!

फुर फुर-फुर फुर उड़ें चहकती,
घर-घर, छत-छत फिरें लहकती।
रुनझुन, फुदक फुदक कर डोलें,
चिड़ियाँ चह-चूँ, चह-चूँ बोलें!

हिल-मिल, घूम-घूम सब आवें,
खिल-खिल, झूम-झूम सब गावें।
बोलों में मिसरी-सी घोलें,
चिड़ियाँ चह-चूँ, चह-चूँ बोलें!

छेड़ें कभी बैठ कर तानें,
भर लें फर-फर कभी उड़ानें!
अपना जोर हवा में तोलें,
चिड़ियाँ चह-चूँ, चह-चूँ बोलें!

-साभार: वीणा के गीत, सं. राष्ट्रबंधु, 1967